झुंझुनू जिले के केड गांव में आयोजित जनसुनवाई केवल शिकायत सुनने का मंच नहीं रही, बल्कि यह कार्यक्रम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े करने वाला बन गया। ग्रामीण बड़ी उम्मीदों के साथ जनसुनवाई में पहुंचे थे, लेकिन जैसे ही अवैध खनन का मुद्दा उठा, माहौल पूरी तरह बदल गया। लोगों का गुस्सा, दर्द और नाराजगी साफ तौर पर देखने को मिली।
गांवों की जमीन, पानी और घरों से जुड़ी समस्याएं अब सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहीं। जनसुनवाई में आए ग्रामीणों ने बताया कि पहाड़ियों में हो रहे बेतरतीब खनन ने उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। इसी कारण जनसुनवाई में बात सामान्य शिकायतों से आगे बढ़कर गंभीर प्रशासनिक चूक तक पहुंच गई।
जब प्रभारी मंत्री अविनाश गहलोत को इन हालातों की जानकारी दी गई, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के अधिकारियों से जवाब मांगा। इसके बाद जनसुनवाई का स्वर पूरी तरह सख्त और निर्णायक नजर आया।
ग्रामीणों का आरोप: प्रशासन की चुप्पी से बढ़ा संकट
गुढ़ागौड़जी क्षेत्र के बामलास और गुढ़ा बावनी गांवों से आए ग्रामीणों ने बताया कि अवैध खनन का काम लंबे समय से चल रहा है। लोगों का कहना था कि बार-बार शिकायतें देने के बावजूद न तो खनन रुका और न ही किसी जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई हुई। इससे ग्रामीणों में यह भावना गहरी हो गई कि उनकी आवाज को जानबूझकर अनसुना किया जा रहा है।
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि पिछले कई दिनों से वे धरने पर बैठे हैं, लेकिन ठंड और परेशानियों के बावजूद किसी अधिकारी ने मौके पर आकर स्थिति को समझने की कोशिश नहीं की। इसी उपेक्षा के कारण जनसुनवाई में लोगों का आक्रोश खुलकर सामने आया।
खनन का असर: घर, जमीन और पानी सब पर खतरा
अवैध खनन का प्रभाव अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर गांवों के ढांचों पर पड़ रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि खनन के कारण जमीन कमजोर हो गई है, जिससे कई मकानों में दरारें आ चुकी हैं। कुछ परिवारों को तो अपने घरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता सताने लगी है।
पानी की समस्या भी तेजी से बढ़ी है। कुएं सूखने लगे हैं और कई जगहों पर मोटरें जमीन में धंस गई हैं। जिन प्राकृतिक जल स्रोतों पर गांव निर्भर थे, वे लगभग समाप्त होने की कगार पर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले समय में पीने के पानी तक के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है।
नियमों की अनदेखी और जमीनों पर कब्जे के आरोप
ग्रामीणों ने जनसुनवाई में सिर्फ खनन की बात नहीं उठाई, बल्कि इसके तरीके पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उनका आरोप है कि खनन स्वीकृत लीज क्षेत्र से बाहर तक फैल चुका है। इसके अलावा गौचर और चरागाह जैसी सार्वजनिक भूमि पर भी कब्जा कर लिया गया है।
लोगों ने यह भी कहा कि पर्यावरण से जुड़े नियमों और निर्देशों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। न तो सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है और न ही पर्यावरण संतुलन की चिंता की जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, यह सब कुछ प्रशासन की जानकारी में होते हुए भी कार्रवाई नहीं होना सबसे बड़ा सवाल है।
प्रभारी मंत्री का सख्त रुख, अधिकारियों को चेतावनी
ग्रामीणों की बात सुनने के बाद प्रभारी मंत्री अविनाश गहलोत का तेवर साफ तौर पर बदला नजर आया। उन्होंने अधिकारियों से सवाल किया कि जब लोग ठंड में सड़कों पर बैठकर विरोध कर रहे हैं, तो प्रशासन आखिर क्या कर रहा है। मंत्री ने इसे गंभीर लापरवाही बताते हुए नाराजगी जाहिर की।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तय समय में पेश की जाए। साथ ही यह भी संकेत दिया कि यदि निर्धारित समय में संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला सीधे उच्च स्तर तक ले जाया जाएगा। मंत्री की इस चेतावनी से प्रशासनिक अमले में हलचल साफ महसूस की गई।
जांच कमेटी बनी, लेकिन नतीजों पर सवाल
जनसुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि अवैध खनन की जांच के लिए पहले ही एक कमेटी बनाई जा चुकी है। जिला प्रशासन का कहना है कि प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन जमीन पर असर क्यों नहीं दिखा, यह बड़ा सवाल बनकर सामने आया।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने भी यही मांग की कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसके आधार पर ठोस कदम उठाए जाएं। लोगों का कहना है कि जब तक दोषियों पर सीधी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक अवैध खनन रुकने वाला नहीं है।
जनसुनवाई में दिखी राजनीतिक और प्रशासनिक सक्रियता
इस जनसुनवाई में जिले के कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद रहे। सभी ने ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीर बताते हुए समाधान की जरूरत पर सहमति जताई। कार्यक्रम के दौरान यह संदेश देने की कोशिश की गई कि अवैध खनन जैसे मामलों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालांकि, ग्रामीण अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि जनसुनवाई के बाद जमीन पर भी बदलाव दिखे। यही कारण है कि अब सभी की नजरें आने वाले कुछ दिनों पर टिकी हैं।
सात दिन की समय-सीमा, आगे क्या?
प्रभारी मंत्री द्वारा दी गई समय-सीमा ने इस पूरे मामले को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। यदि तय अवधि में ठोस कार्रवाई होती है, तो यह ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। वहीं, देरी की स्थिति में यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है।
फिलहाल झुंझुनू जिले में अवैध खनन को लेकर माहौल पूरी तरह गरम है। जनसुनवाई के बाद उम्मीद की जा रही है कि प्रशासन अब सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जमीन पर असर दिखाने वाले फैसले सामने आएंगे।