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बिना कोषाध्यक्ष के घोषित हुईं कांग्रेस की 62 नगर कमेटियां, झुंझुनूं से उठे गंभीर सवाल

राजस्थान की सियासत इन दिनों सिर्फ सत्ता या विपक्ष की रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस संगठन की आंतरिक संरचना भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा हाल ही में 62 नगर कांग्रेस कमेटियों की कार्यकारिणी घोषित की गई, लेकिन इन सूचियों में एक ऐसी कमी सामने आई जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी—किसी भी नगर कमेटी में कोषाध्यक्ष का पद नहीं है

खासतौर पर झुंझुनूं जिले की आठ नगर कांग्रेस कमेटियां, जिनकी कार्यकारिणी भी इसी आदेश के तहत घोषित हुई है, अब सवालों के घेरे में हैं। संगठन के इतने बड़े विस्तार के बावजूद अगर वित्तीय जिम्मेदारी संभालने वाला चेहरा ही नहीं होगा, तो पार्टी स्तर पर कार्यक्रम, आंदोलन और प्रचार गतिविधियां कैसे संचालित होंगी? यही सवाल अब कांग्रेस कार्यकर्ताओं से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक हर कोई पूछ रहा है।

यह मामला सिर्फ एक पद की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक नीति और भविष्य की रणनीति से जुड़ा माना जा रहा है। इसी वजह से यह फैसला अब पूरे प्रदेश में चर्चा का बड़ा मुद्दा बन चुका है।


प्रदेश नेतृत्व का आदेश, लेकिन अधूरी तस्वीर

प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से जारी इस फैसले को गोविंद सिंह डोटासरा के निर्देशों से जोड़ा जा रहा है। घोषित सूचियों के अनुसार, हर नगर कांग्रेस कमेटी में अध्यक्ष सहित कुल 31 पदाधिकारी और सदस्य बनाए गए हैं।
झुंझुनूं जिले में जिन नगर कांग्रेस कमेटियों को नया आकार दिया गया है, उनमें पिलानी, मलसीसर, बिसाऊ, उदयपुरवाटी, नवलगढ़, मुकुंदगढ़, डूंडलोद और बुहाना शामिल हैं।

सूची देखने पर साफ होता है कि संगठनात्मक ढांचा तो मजबूत दिखाया गया है, लेकिन वित्तीय व्यवस्था का कोई स्पष्ट चेहरा सामने नहीं रखा गया


पदों की भरमार, मगर पैसे की जिम्मेदारी किसके पास?

हर नगर कार्यकारिणी में
अध्यक्ष, महासचिव संगठन, प्रवक्ता, सोशल मीडिया प्रभारी जैसे पद शामिल हैं।
इसके साथ ही कई उपाध्यक्ष, महासचिव और सचिव भी बनाए गए हैं।
इतना ही नहीं, सांसद, विधायक, पूर्व विधायक, पूर्व सांसद, एआईसीसी और पीसीसी सदस्य, ब्लॉक अध्यक्ष और अग्रिम संगठनों के पदाधिकारी विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल किए गए हैं।

लेकिन इन सबके बीच कोषाध्यक्ष का न होना अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला या तो अस्थायी व्यवस्था है या फिर पार्टी ने जानबूझकर वित्तीय नियंत्रण को ऊपर के स्तर पर रखने का निर्णय लिया है।


अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व से बदला समीकरण

झुंझुनूं जिले की नगर कांग्रेस कमेटियों में अल्पसंख्यक समुदाय की मजबूत भागीदारी भी नजर आई है।
बिसाऊ नगर कांग्रेस कमेटी में तो कुल 31 सदस्यों में से 21 अल्पसंख्यक शामिल किए गए हैं, जो अपने आप में बड़ा आंकड़ा है।

अन्य नगरों में भी अल्पसंख्यकों की भागीदारी उल्लेखनीय रही है। इस कदम को कांग्रेस की सामाजिक संतुलन और वोट बैंक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।


जातीय गणित भी बना चर्चा का विषय

जहां एक तरफ अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर जातीय समीकरण भी साफ दिख रहे हैं।
बुहाना नगर कांग्रेस कमेटी में बड़ी संख्या में ऐसे पदाधिकारी हैं जिनके नाम के साथ ‘सिंह’ जुड़ा हुआ है।
उदयपुरवाटी में सैनी समाज की मजबूत मौजूदगी ने भी स्थानीय राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सब आगामी चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर किया गया संतुलन हो सकता है।


बिसाऊ कमेटी की सूची पर अलग ही बवाल

बिसाऊ नगर कांग्रेस कमेटी उस वक्त सुर्खियों में आई जब सूची में मृत नेताओं के नाम शामिल पाए गए।
कांग्रेस नेताओं की सफाई है कि गलती से पुरानी कार्यकारिणी की सूची जारी हो गई थी और जल्द ही नई सूची जारी कर स्थिति साफ कर दी जाएगी।
हालांकि इस घटना ने संगठन की प्रक्रियात्मक गंभीरता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।


आखिरकार वही सवाल—बिना ‘कोष’ कैसे चलेगा कांग्रेस संगठन?

अब पूरा प्रदेश यही पूछ रहा है कि नगर स्तर पर कांग्रेस की गतिविधियां बिना कोषाध्यक्ष के कैसे संचालित होंगी?
धरना-प्रदर्शन, सभाएं, पोस्टर, प्रचार सामग्री और रोजमर्रा के संगठनात्मक खर्च—इन सबके लिए धन जरूरी होता है।

क्या भविष्य में कोषाध्यक्ष की नियुक्ति होगी?
या फिर कांग्रेस ने एक नई व्यवस्था के तहत वित्तीय नियंत्रण सीधे जिला या प्रदेश स्तर पर रखने का फैसला किया है?

फिलहाल इतना तय है कि यह निर्णय राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में नई बहस और नई बेचैनी जरूर पैदा कर चुका है।

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